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Tuesday, 6 December 2011

आज़ादी बहुमूल्य होती है.

आज़ादी बहुमूल्य होती है. इसलिए, इसे यु ही सबो को प्रदान नहीं करना चाहिए. भारत की आज़ादी के बाद हम ऐसे बदल गए है की हममें से कई लोगो को आज़ादी की महत्ता ठीक से पता नहीं चल रहा है. इसी पृष्ठभूमि पर कुछ फिल्म्स भी बने है.
 ऐसा नहीं है की हम देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत नहीं है लेकिन हम  मौसमी देशभक्त बनते जा रहे है. संभवतः आप सभी इस बात से सहमत होंगे. बात केवल राष्ट्रीय स्तर की नहीं है. यदि हम परिवार स्तर पर विचार करे तो हम पाएंगे की परिवार में भी सदस्यों के मध्य एक सिमित स्वतंत्रता का ही प्रयोग करना चाहिए.  परिवार में हर उम्र के सदस्य होते है. बड़ो तथा छोटो दोनो को अपनी आज़ादी के सीमा का ज्ञान होना चहिये. 
आज़ादी के साथ हमारी कर्तव्य जुडी होती है. उन कर्तव्यो के प्रति हमें जागरुक  होना तथा उसका निर्वाह करना दोनों ही समयानुकूल पूर्ण  होना चाहिए. जहा  तक स्वतंत्रता का प्रश्न है मेरे विचार से हमारी कर्तव्य हमारे अधिकार से कही अधिक मायने रखती है. सिमित स्वतंत्रता को अर्थ परतंत्रता कदापि नहीं है बल्कि इसका तात्पर्य  कुछ हद तक संतुलित नियंत्रण से है. स्वतंत्रता संपूर्ण विकास के लिए वातावरण प्रदान कराती है लेकिन किसी फल या फूल के पोधे की भाति हमारी वृद्धि  हो तो आज़ादी सार्थक होगी अन्यथा हम जंगल झाड़ ही बन पाएंगे.  

Sunday, 27 November 2011

हिंदी भाषा


"उस हिंदी भाषा के खेत में भावों की सुनहली फसल लहलहा रही हो, वह भाषा भले ही कुछ दिनों यों ही उपेक्षित पड़ी रहे पर उसकी स्वाभिक उर्वरता अप्रभावित रहेगी. वहां फिर हरीतिमा के दिन आयेंगे और पौष मास में फिर 'नवान्न उत्सव' आयोजित होगा.'' 
                           --गुरुदेव 

हिंदी एक भारतीय भाषा है . भाषा कोई भी हो, वह अभिव्यक्ति की सशक्त माध्यम होती है. हिंदी मेरी मातृभाषा है. मेरे संस्कार, भाव- विचार, व्यबहार तथा अभिव्यक्ति की क्षमता आदि सभी हिंदी से ही संपोषित है. हिंदी के ऋण से हम कभी भी  उऋण नहीं हो सकते है. 

मुझे लगता है की मनुष्य की सम्प्रेषण- शक्ति ही उसे सृष्टी का सफल प्राणी बनाया है. सम्प्रेषण की आंतरिक आवश्यकता से भाषा की उत्त्पति हुई होगी और फिर उससे प्राप्त ज्ञान के प्रवाह के लिये विज्ञान का उदय हुआ होगा. विज्ञान का अर्थ उस ज्ञान अथवा उस क्रमबद्ध अध्ययन की प्रक्रिया से है जो इस भौतिक जगत में  घटित हो रहा है. 

"सम्प्रेषण" हिंदी का इतिहास, उसके विविध रूपों, प्रयोगों तथा प्रभाव को समझने एवं उसका क्रमबद्ध अध्ययन करने का मेरा लघु प्रयास मात्र  है. साथ ही अभिव्यक्ति का माध्यम भी. 

भारतीय संविधान की ८ वीं अनुसूची के भाग 'क' में २२ भाषाएँ और भाग 'ख' में शेष भाषाएँ सम्मिलित किये गए है. १९६१ तथा १९७१ की जनगणना के अनुसार भारत में  मत्त्रिभाषाएं  की कुल संख्या १६५२ है तथा १८७ भाषाएँ है. स्पष्ट है की भारत एक बहुभाषी देश है. 

विश्व की जनसँख्या का १६% भाग इंडो यूरोपियन परिवार की इंग्लिश भाषा तथा चीनी परिवार की मंदारिन भाषा का प्रयोग करती है . दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा हिंदी है. हिंदी को विश्व के लगभग १५% जनसँख्या बोलते है. संविधान की अनुच्छेद ३४३ के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है. अरुणाचल प्रदेश, अंदमान - निकोबार, बिहार, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, मध्यप्रदेश, राजस्थान , उत्तरप्रदेश, और उत्तरांचल में भी हिंदी ही राजभाषा है. 

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है की हिंदी अब विश्वभाषा के रूप में स्थापित है. अतैव इसकी व्यापकता, प्रसार तथा सामर्थ्य का अनुसन्धान हमारा दायित्व है. संभवत आप भी मुझसे सहमत होंगे.
आशा है की हम भारतीय अपनी जिम्मेवारी  समझेंगे तथा राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह  करेंगे. 
जय हिंद .
धन्यवाद. 

Friday, 11 November 2011

जीवन भी किसी पुस्तक के समान होता है.......

सम्प्रेषण !
"सम्प्रेषण" ही किस लिए ? 
मेरा मानना है कि  मनुष्य की विशिष्टता इस वजह से है कि उसने भाषाओं की खोज करने मे अपना योगदान किया था. 
भाषा का उपयोग, हमारी संभावनाओं को निर्धारित करता है. यह मनुष्य की मानसिक क्षमता को भी इंगित करता है. दुनिया के प्रत्येक भाषा की अपनी एक वर्णमाला या प्रतीक होती है जो एक - दुसरे के साथ संचार या सम्प्रेषण हेतु महान उपकरण प्रदान करता है. 
वर्णमाला के अक्षरों के मिलाने से शब्द बनता है. कुछ शब्दों के मिलाने से वाक्यांश बनते है. वाक्याँशो अथवा शब्दों के सार्थक मिलन से अर्थपूर्ण वाक्य बनते है. वाक्य विभिन्न प्रकार के भावनाओ  को व्यक्त करता है. विभिन्न भावों वाले वाक्यों से अनुच्छेद बनते है. अनुच्छेद मिलकर किसी पुस्तक का एक अध्याय बनाता है. कई अध्याय मिलकर एक पुस्तक बनाते है. अतः पुस्तक कई अध्यायों में बँटी होती है. यह किसी पुस्तक के जीवन यात्रा है. किन्तु पुस्तक की यात्रा का यह अंतिम पड़ाव नहीं होता है. पुस्तकों   के प्रकाशन या अस्तित्व में आने के पश्चात् उसे पहचान की जरुरत होती है. पहचान भी सभी पुस्तकों के लिए अंतिम लक्ष्य नहीं होता है. पुस्तकों की पात्रता तथा सफलता का निर्धारण पाठको पर होता है. जाहिर है कि पुस्तकों का भाग्य पाठको के रूचि तथा उनपर पड़े प्रभाव पर निर्भर करता है. 
हमारा जीवन भी किसी पुस्तक के समान होता है. सोचे!
हर एक  पुस्तक कुछ न कुछ अवश्य व्याख्या करता है. यह विचारो को संप्रेषित करती है. हर जिंदगी मानो ऐसी ही है.  
सम्प्रेषण के लिए आज ही क्यों ?
आज एक दुर्लभ  संयोग है. आज ११-११-११ है. यह शताब्दियों का संयोग  है. बस इसीलिए. 
धन्यवाद्!