Wednesday, 7 December 2011

हिंदी के रूप : हमारा प्रयोजन


सूक्ति : '' उस भाषा को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए जो देश के बड़े हिस्से में बोली जाती है अर्थात हिंदी ''--- रवीन्द्रनाथ ठाकुर 

व्यवहार की दृष्टी से हिंदी भाषा के मुख्यतः ३ रूप है: 


  1. सामान्य हिंदी  जो दैनिक बोलचाल की हिंदी है . इसमें कोई पारिभाषिक शब्दावली नहीं होती है. 
  2. रचनात्मक हिंदी  जो साहित्य रचना की हिंदी है. इसमे  अनुभव तथा कल्पना का समन्वय आवश्यक रूप में होता है. इसमें कला और शैली के शास्त्र का अनुसरण होता है. 
  3. प्रयोजनमूलक हिंदी  जो व्यवहारिक प्रयोजन में प्रयुक्त होती ही. यह साहित्येतर हिंदी है. इसमें विशेष ज्ञान की जरुरत नहीं होती है. इसकी प्रयोजन अनुकूल पारिभाषिक शब्दावली होती है. यह भाषा की मानक संरचना का अनुसरण कराती है. इंग्लिश भाषा में इसे functional language कहा जाता है. 
प्रयोजन मूलक हिंदी में निम्नांकित वर्ग है: 

  1. प्रशासनिक हिंदी यथा परिपत्र, अधिसूचना .................
  2. व्यवसायिक हिंदी यथा खाता, निवेश .......................
  3. तकनिकी हिंदी यथा अयस्क, घर्षण .......................
  4. जन्संचारी हिंदी यथा अनुवाद, पटकथा .................
  5. विधिक हिंदी यथा करारनामा आदि. 
अतः विशेष प्रजोजन हेतु विशिष्ट जनों द्वारा प्रयुक्त हिंदी को प्रजोजन मूलक हिंदी कहा जाता है. 

धन्यवाद

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