Tuesday, 6 December 2011

आज़ादी बहुमूल्य होती है.

आज़ादी बहुमूल्य होती है. इसलिए, इसे यु ही सबो को प्रदान नहीं करना चाहिए. भारत की आज़ादी के बाद हम ऐसे बदल गए है की हममें से कई लोगो को आज़ादी की महत्ता ठीक से पता नहीं चल रहा है. इसी पृष्ठभूमि पर कुछ फिल्म्स भी बने है.
 ऐसा नहीं है की हम देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत नहीं है लेकिन हम  मौसमी देशभक्त बनते जा रहे है. संभवतः आप सभी इस बात से सहमत होंगे. बात केवल राष्ट्रीय स्तर की नहीं है. यदि हम परिवार स्तर पर विचार करे तो हम पाएंगे की परिवार में भी सदस्यों के मध्य एक सिमित स्वतंत्रता का ही प्रयोग करना चाहिए.  परिवार में हर उम्र के सदस्य होते है. बड़ो तथा छोटो दोनो को अपनी आज़ादी के सीमा का ज्ञान होना चहिये. 
आज़ादी के साथ हमारी कर्तव्य जुडी होती है. उन कर्तव्यो के प्रति हमें जागरुक  होना तथा उसका निर्वाह करना दोनों ही समयानुकूल पूर्ण  होना चाहिए. जहा  तक स्वतंत्रता का प्रश्न है मेरे विचार से हमारी कर्तव्य हमारे अधिकार से कही अधिक मायने रखती है. सिमित स्वतंत्रता को अर्थ परतंत्रता कदापि नहीं है बल्कि इसका तात्पर्य  कुछ हद तक संतुलित नियंत्रण से है. स्वतंत्रता संपूर्ण विकास के लिए वातावरण प्रदान कराती है लेकिन किसी फल या फूल के पोधे की भाति हमारी वृद्धि  हो तो आज़ादी सार्थक होगी अन्यथा हम जंगल झाड़ ही बन पाएंगे.  

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