Thursday, 8 December 2011

नव साम्राज्य के नए किस्से


 
अरुंधती रॉय की पुस्तक नव साम्राज्य के नए किस्से  पढ़ा जो उनके बिभिन्न लेखो का संग्रह है. उक्त पुस्तक में एक लेख है : सितम्बर का साया...........
 वे लिखती है की:
" लेखको का मानना है की वे दुनिया से कथाये चुनते है. मै यह मानने लगी हु की उनकी इस सोच के पीछे उनका अहम् है. जबकि है इसका ठीक उल्टा. कथाये लेखको को दुनिया से चुनती है . कथाये हमारे सामने उद्घाटित होते है. सार्वजनिक वृतांत, निजी आख्यान .................ये हमे अपना उपनिवेश बना देती है. वे हमे लिखने के लिए उकसाती है. वे हम पर दवाव डालती है की हम उन्हें रचे. कथा तथा इतर कथा साहित्य मात्र कथा कहने की भिन्न तरीके है. मै ठीक से नहीं जानती की क्या कारन है की कथा मेरे अन्दर से नाचती हुई निकलती है. गैर -कथात्मक लेखन दर्द की उस ऐठन से, उस टूटी -फूटी दुनिया से उपजता है जिससे हर सुबह  मेरा सबका पड़ता है..........

लेखक जॉन बर्जर ने लिखा है-' कोई भी कहानी अपने आप मे अकेली नहीं हो सकती. अकेली कहानी हो ही नहीं सकती. ' ..............."

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