Wednesday, 30 November 2011

इंदिरा गोस्वामी

इंदिरा गोस्वामी जो मामोनी  गोस्वामी ( जन्म 14 नवम्बर १९४२) के नाम से भी जानी  जाती  है, एक लोकप्रिय संपादक, कवियत्री , प्रोफेसर, विदुषी और साहित्यकार रही है. उनका निधन  29 नवम्बर २०११ को हुआ. यह हमारे लिए अकल्पनीय क्षति है. 

वह साहित्य अकादमी पुरस्कार के विजेता (1982),  ज्ञानपीठ पुरस्कार (2000) और कई अन्य  पुरस्कार की विजेता रही है.  समकालीन भारतीय साहित्य के सबसे प्रसिद्ध   साहित्यकारों  में से वे एक थी.  अपने  लेखन के माध्यम से उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की नीब रखी. वे  अलगाववादी असम के यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट और भारत की केंद्रीय सरकार के बीच मध्यस्थ के रूप में सफल भूमिका अदा की. 


पाकिस्तान पर उनकी एक अनुदित  कविता  इस प्रकार से है---

ओह पाकिस्तान, दिव्य भूमि!
हमें अपने दिल दे दो!
और बदले में हमारे दिल ले!
एक बार जब हम एक ही आकाश साझा!
एक ही सूरज के साथ आकाश!
हम युद्ध के मैदान पर में जुड़वां बहनों की तरह ही दर्द साझा
धूल हटाने.

.................

दोस्तों! तुम  रहो खुश,
... अब रह  रहे हो जहाँ !
 स्मृति कभी मारती नहीं ,

 कवियों का कहना है

दूरी केवल इसे  करती है शुद्ध ...
हम एक ही पेड़ के नीचे बैठे थे,
एक ही फूल की खुशबू का आनंद लिया
एक  समय तक...
किन्तु कई टुकड़े में है अब ! 
नष्ट पहाड़ और फूल के उद्यान 
जहां 
हम खेला था!
............
हमारी तरफ से उन्हें शत शत नमन. 

Monday, 28 November 2011

जिन्हें पढ़ कर हम बड़े हुए .....

 प्रख्यात हिंदी साहित्यकार  कुमार विमल का एक निजी अस्पताल में लंबी बीमारीके बाद शनिवार २६ नवम्बर २०११ को सुबह १०:४० बजे  निधन हो गया. वे  80 वर्ष के थे. उनके पार्थिव शरीर को लोहिया नगर , कंकर बाग़ में उनके आवास पर लाया गया. वे मूलत लखीसराय के पचेना गावं के रहने वाले थे. चार भाइयो में सबसे बड़े डॉक्टर विमल अपनी पत्नी,  चार बेटियोंऔर दो ​​बेटों से भरा पूरा परिवार छोड गए. उनकी कई कविताएं अंग्रेजी, बंगाली, तेलुगु, मराठी, उर्दू और कश्मीरी में अनुवाद किया गया. अपने महत्वपूर्ण पुस्तकों के अलावा 'मूल्य और मीमांसा ' और कविताएं 'अंगार' और 'सगरमाथा ' उनकी प्रसिद्ध रचना हैं. श्री विमल पूर्व नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के कुलपति, बिहार लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और बिहार इंटरमीडिएट शिक्षा परिषद के पूर्व अध्यक्ष के अलावा वे डी जे कॉलेज मुंगेर, जैन कॉलेज आरा और औरर पटना विश्वविद्यालय के अध्यक्ष भी रहे.  वे १९७० में बिहार राष्ट्रभाषा  परिषद् के निदेशक बने. उनका जन्म १२ अक्टूबर १९३१ को उनके ननिहाल भागलपुर जिले के कल्चुक में हुआ था. 
उन्हें शत शत नमन!

Sunday, 27 November 2011

हिंदी भाषा


"उस हिंदी भाषा के खेत में भावों की सुनहली फसल लहलहा रही हो, वह भाषा भले ही कुछ दिनों यों ही उपेक्षित पड़ी रहे पर उसकी स्वाभिक उर्वरता अप्रभावित रहेगी. वहां फिर हरीतिमा के दिन आयेंगे और पौष मास में फिर 'नवान्न उत्सव' आयोजित होगा.'' 
                           --गुरुदेव 

हिंदी एक भारतीय भाषा है . भाषा कोई भी हो, वह अभिव्यक्ति की सशक्त माध्यम होती है. हिंदी मेरी मातृभाषा है. मेरे संस्कार, भाव- विचार, व्यबहार तथा अभिव्यक्ति की क्षमता आदि सभी हिंदी से ही संपोषित है. हिंदी के ऋण से हम कभी भी  उऋण नहीं हो सकते है. 

मुझे लगता है की मनुष्य की सम्प्रेषण- शक्ति ही उसे सृष्टी का सफल प्राणी बनाया है. सम्प्रेषण की आंतरिक आवश्यकता से भाषा की उत्त्पति हुई होगी और फिर उससे प्राप्त ज्ञान के प्रवाह के लिये विज्ञान का उदय हुआ होगा. विज्ञान का अर्थ उस ज्ञान अथवा उस क्रमबद्ध अध्ययन की प्रक्रिया से है जो इस भौतिक जगत में  घटित हो रहा है. 

"सम्प्रेषण" हिंदी का इतिहास, उसके विविध रूपों, प्रयोगों तथा प्रभाव को समझने एवं उसका क्रमबद्ध अध्ययन करने का मेरा लघु प्रयास मात्र  है. साथ ही अभिव्यक्ति का माध्यम भी. 

भारतीय संविधान की ८ वीं अनुसूची के भाग 'क' में २२ भाषाएँ और भाग 'ख' में शेष भाषाएँ सम्मिलित किये गए है. १९६१ तथा १९७१ की जनगणना के अनुसार भारत में  मत्त्रिभाषाएं  की कुल संख्या १६५२ है तथा १८७ भाषाएँ है. स्पष्ट है की भारत एक बहुभाषी देश है. 

विश्व की जनसँख्या का १६% भाग इंडो यूरोपियन परिवार की इंग्लिश भाषा तथा चीनी परिवार की मंदारिन भाषा का प्रयोग करती है . दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा हिंदी है. हिंदी को विश्व के लगभग १५% जनसँख्या बोलते है. संविधान की अनुच्छेद ३४३ के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है. अरुणाचल प्रदेश, अंदमान - निकोबार, बिहार, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, मध्यप्रदेश, राजस्थान , उत्तरप्रदेश, और उत्तरांचल में भी हिंदी ही राजभाषा है. 

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है की हिंदी अब विश्वभाषा के रूप में स्थापित है. अतैव इसकी व्यापकता, प्रसार तथा सामर्थ्य का अनुसन्धान हमारा दायित्व है. संभवत आप भी मुझसे सहमत होंगे.
आशा है की हम भारतीय अपनी जिम्मेवारी  समझेंगे तथा राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह  करेंगे. 
जय हिंद .
धन्यवाद. 

Friday, 11 November 2011

जीवन भी किसी पुस्तक के समान होता है.......

सम्प्रेषण !
"सम्प्रेषण" ही किस लिए ? 
मेरा मानना है कि  मनुष्य की विशिष्टता इस वजह से है कि उसने भाषाओं की खोज करने मे अपना योगदान किया था. 
भाषा का उपयोग, हमारी संभावनाओं को निर्धारित करता है. यह मनुष्य की मानसिक क्षमता को भी इंगित करता है. दुनिया के प्रत्येक भाषा की अपनी एक वर्णमाला या प्रतीक होती है जो एक - दुसरे के साथ संचार या सम्प्रेषण हेतु महान उपकरण प्रदान करता है. 
वर्णमाला के अक्षरों के मिलाने से शब्द बनता है. कुछ शब्दों के मिलाने से वाक्यांश बनते है. वाक्याँशो अथवा शब्दों के सार्थक मिलन से अर्थपूर्ण वाक्य बनते है. वाक्य विभिन्न प्रकार के भावनाओ  को व्यक्त करता है. विभिन्न भावों वाले वाक्यों से अनुच्छेद बनते है. अनुच्छेद मिलकर किसी पुस्तक का एक अध्याय बनाता है. कई अध्याय मिलकर एक पुस्तक बनाते है. अतः पुस्तक कई अध्यायों में बँटी होती है. यह किसी पुस्तक के जीवन यात्रा है. किन्तु पुस्तक की यात्रा का यह अंतिम पड़ाव नहीं होता है. पुस्तकों   के प्रकाशन या अस्तित्व में आने के पश्चात् उसे पहचान की जरुरत होती है. पहचान भी सभी पुस्तकों के लिए अंतिम लक्ष्य नहीं होता है. पुस्तकों की पात्रता तथा सफलता का निर्धारण पाठको पर होता है. जाहिर है कि पुस्तकों का भाग्य पाठको के रूचि तथा उनपर पड़े प्रभाव पर निर्भर करता है. 
हमारा जीवन भी किसी पुस्तक के समान होता है. सोचे!
हर एक  पुस्तक कुछ न कुछ अवश्य व्याख्या करता है. यह विचारो को संप्रेषित करती है. हर जिंदगी मानो ऐसी ही है.  
सम्प्रेषण के लिए आज ही क्यों ?
आज एक दुर्लभ  संयोग है. आज ११-११-११ है. यह शताब्दियों का संयोग  है. बस इसीलिए. 
धन्यवाद्!