सम्प्रेषण !
"सम्प्रेषण" ही किस लिए ?
मेरा मानना है कि मनुष्य की विशिष्टता इस वजह से है कि उसने भाषाओं की खोज करने मे अपना योगदान किया था.
भाषा का उपयोग, हमारी संभावनाओं को निर्धारित करता है. यह मनुष्य की मानसिक क्षमता को भी इंगित करता है. दुनिया के प्रत्येक भाषा की अपनी एक वर्णमाला या प्रतीक होती है जो एक - दुसरे के साथ संचार या सम्प्रेषण हेतु महान उपकरण प्रदान करता है.
वर्णमाला के अक्षरों के मिलाने से शब्द बनता है. कुछ शब्दों के मिलाने से वाक्यांश बनते है. वाक्याँशो अथवा शब्दों के सार्थक मिलन से अर्थपूर्ण वाक्य बनते है. वाक्य विभिन्न प्रकार के भावनाओ को व्यक्त करता है. विभिन्न भावों वाले वाक्यों से अनुच्छेद बनते है. अनुच्छेद मिलकर किसी पुस्तक का एक अध्याय बनाता है. कई अध्याय मिलकर एक पुस्तक बनाते है. अतः पुस्तक कई अध्यायों में बँटी होती है. यह किसी पुस्तक के जीवन यात्रा है. किन्तु पुस्तक की यात्रा का यह अंतिम पड़ाव नहीं होता है. पुस्तकों के प्रकाशन या अस्तित्व में आने के पश्चात् उसे पहचान की जरुरत होती है. पहचान भी सभी पुस्तकों के लिए अंतिम लक्ष्य नहीं होता है. पुस्तकों की पात्रता तथा सफलता का निर्धारण पाठको पर होता है. जाहिर है कि पुस्तकों का भाग्य पाठको के रूचि तथा उनपर पड़े प्रभाव पर निर्भर करता है.
हमारा जीवन भी किसी पुस्तक के समान होता है. सोचे!
हमारा जीवन भी किसी पुस्तक के समान होता है. सोचे!
हर एक पुस्तक कुछ न कुछ अवश्य व्याख्या करता है. यह विचारो को संप्रेषित करती है. हर जिंदगी मानो ऐसी ही है.
सम्प्रेषण के लिए आज ही क्यों ?
आज एक दुर्लभ संयोग है. आज ११-११-११ है. यह शताब्दियों का संयोग है. बस इसीलिए.
धन्यवाद्!
सम्प्रेषण के लिए आज ही क्यों ?
आज एक दुर्लभ संयोग है. आज ११-११-११ है. यह शताब्दियों का संयोग है. बस इसीलिए.
धन्यवाद्!
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